पता नहीं कितने रहस्य और सच ये मनुष्य अपने सीने में दबाये घूमता रहता है..जीता रहता है..हस्त है..रोता है.,बोलता है..गाता है..प्यार करता है..और सम्भंधो में भी पड़ता है...
ज़िन्दगी न जाने कितने उन्बुझे सवालो की गठरी है..जिसे हम कभी समझ ही नहीं पते है...हमारा दिल न जाने कितना एहसासों को पढ़ लेता है और हम अनजाने ही बिना समझे ही आगे बढ़ जाते है....वो काम कर जाते है.और यह हो जाने के बाद भी हम यकीन नहीं कर पाते है की क्या हम ये सच में चाहते थे...
यह बातें ज़रा पेचीदा है..और हम इन्हें अपने जीवन के हर एक नए मोड़..नए हिस्सों में महसूस करते है खासकर जब हमसे गलतियां होती है...जब हम कोई चीज़ बेंतेहा चाहते है...पर वो चीज़ हमें हर दम कई नए आंसुओ से नवाजती है
कई गलतियां हमारे चरिर्त्र से जोड़ कर टटोला जाता है और कई हमारी इच्छा , महत्वकंशा, और सपनो से...मैं यहाँ दो अलग बातें कर रहा हूँ एक चरित्र की...एक भावनाओ की...ये दोनों का मिश्रण किस तरह से होता है...ये भी एक गहरा सच है...
इंसान के कर्म उसके चरित्र से होके निकलते है...उसकी सोच बनते है..और विश्वास का आधार भी...जब उसपे मुश्किल वक़्त आता है..तो इन्ही चीजों का जबरदस्त मिश्रण ही उसे कर्म करने की इज़ाज़त देता है...अगर यहाँ मैं उद्धरण के तौर पे भावनात्मक स्मभंधो को लूँ...एक लड़का और लड़की का...तो इन चीजों को समझना और समझाना ज्यादा आसान हो जाता है..जब एक लड़का किसी लड़की को चाहता है..और वो संभंध में होते है..पर किसी कारणवश वो एक नहीं हो पाते है तब उन दोनों के दिलो में एक अजीब सा खालीपन घर कर जाता है..और उन्स घेर लेती है वो खुद को संभालता है..आगे बढ़ता है..वो यह कह देता है की उसे अब इन सब चीजों में फिरसे नहीं पड़ना है।

